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चार विद्रोही संत, एक ही सच

इच्छा मृत्यु : भारतीय परिप्रेक्ष्य

इच्छा मृत्यु से तात्पर्य, शुभ मृत्यु से है। प्रयोगात्मक नीतिशास्त्र ऐसा मानता है कि सामान्यतया मृत्यु शुभ नहीं होती, परंतु कुछ परिस्थितियों में इच्छा मृत्यु को अनैतिक नहीं माना जाना चाहिए, जैसे -

जब कोई ऐसी बीमारी, जिसमें मृत्यु संभावित हो ऐसी बीमारी का इलाज विज्ञान व तकनीक के आधार पर संभव नहीं हो।रोगी को असहनीय दर्द हो, जिसमें मृत्यु की संभावना हो,रोगी स्वयं इसकी इच्छा व्यक्त करता हो।रोगी के परिजन भी ये मानते हो कि अब कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है।प्रतिष्ठित अस्पताल व एसोसिएशन की तरफ से प्रमाणित किया गया हो कि ऐसी बीमारी का इलाज संभव नहीं है।मृत्यु देने हेतु विशेषज्ञ उपलब्ध हों।

इसी आधार पर नीदरलैंड, लग्जमबर्गलैंड, मोण्टाना, वॉशिंगटन डी.सी. जैसे प्रांतों में यूथेनेशिया को मान्यता दी गई है।इन बिंदुओं के साथ यदि न्यायपालिका भी सहमति रखती है, तो ये सबसे बेहतर परिस्थितियाँ है।

इच्छा मृत्यु को दो आधार पर विभक्त किया गया है

Active : इसमें रोगी को बाहरी तौर पर इन्जेक्शन दिये जाते हैं, उन्हें Active इच्छामृत्यु कहते हैं।

Passive: जब रोगी को Life support system से हटा दिया जाता है, उसे Passive इच्छामृत्यु कहते हैं।

भारत के परिप्रेक्ष्य में इच्छा मृत्यु का विषय

राष्ट्रीय विधि आयोग ने भारतीय परिप्रेक्ष्य में Passive इच्छामृत्यु को मान्यता दी गई, इसके लिए कानून बनाने का विचार किया।

सर्वोच्च न्यायालय ने संसद को कानून पारित करने का निर्देश दिया किंतु ऐसा ना होने पर मार्च 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय परिप्रेक्ष्य में इच्छा मृत्यु को मान्यता दी है।

सर्वोच्च न्यायालय का मत अनुच्छेद 21 में जीवन की स्वतंत्रता व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विचार है, इससे जोड़ते हुए न्यायालय ने इसे संवैधानिक मान्यता दी है। इसके लिए Passive इच्छा मृत्यु की मान्यता प्रदान की गई। इसके लिए Living will की संकल्पना को मान्यता दी गई है।

Living will – यह एक प्रकार की वसीयत है, जिसमें कोई व्यक्ति युवाकाल में इस बात की घोषणा कर सकता है कि यदि भविष्य में यदि कोई बीमारी होती है, तो उसके शरीर पर विज्ञान व तकनीक का कितना प्रयोग किया जाए।

जिन व्यक्तियों के द्वारा ऐसा Living will नहीं लिखा हो, वो परिजन सर्वोच्च न्यायालय से उसकी माँग कर सकते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने मेडिकल बीमारियों के लिए बोर्ड के गठन का प्रावधान किया, जो बीमारियाँ लाइलाज होती है और उनके परिप्रेक्ष्य में इच्छा मृत्यु दी जा सकती है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में चुनौतियाँ

Living will की संकल्पना आलोचना से अछूती नहीं है। कोई भी युवा व्यक्ति भविष्य के लिए कौन-कौनसी तकनीकों का उपयोग किया जाएगा, ऐसा पूर्वानुमान कर कोई व्यक्ति वसीयत कैसे लिख सकता है, क्योंकि विज्ञान तकनीकी विकास एक सतत् प्रक्रिया है।
मेडिकल बोर्ड बीमारियों की सूची जारी नहीं कर सकता।
भारत में गरीबी, भूखमरी, ऑनर किलिंग जैसी कई चुनौतियाँ विद्यमान हैं, यदि इच्छा मृत्यु को त्वरित आधार पर मान्यता दे दी जाए तो इसका दुरूपयोग हो सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी चुनौतियों का पूर्वानुमान लगाते हुए चिंता व्यक्त करते हुए संसद से यह अपेक्षा की है कि इस मुद्दे की गंभीरता को समझते हुए इस पर स्पष्ट कानून बनाने की आवश्यकता है।


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